भारत के चार पवित्र धामों में से एक पुरी भी हैं, जो भगवन जगन्नाथ के ऐतिहासिक रथयात्रा के लिए प्रसिद्ध हैं. प्रति वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भारत वर्ष में धार्मिक महामहोत्सवों में सबसे प्रमुख तथा महत्त्वपूर्ण रथयात्रा उत्सव पारंपरिक रीति के अनुसार बड़े धूमधाम से आयोजित किया जाता हैं. यह रथयात्रा भारत ही नहीं विदेशों में भी प्रसिद्ध हैं, बहार से आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र भी हैं. ऐसा मानना हैं की 'जगन्नाथ' पूरी की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के पूण्य के बराबर होता हैं. पश्र्चिमी सागर तट पर बसे पुरी शहर में होने वाली विराट 'जगन्नाथ रथयात्रा उत्सव' के समय आस्था का दुर्लभ नजारा देखने को मिलता हैं. 'जगन्नाथ' पूरी उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्र्वर से आठ कि.मी. की दूरी पर हैं . इस दस दिवसीय महोत्सव की तैयारी अक्षय तृतीय को शुरू होती हैं. 12वीं शताब्दी में पूरी के इस 65 मीटर ऊंचे भब्य मंदिर का निर्माण चोल 'गंगदेव' तथा 'अनंग भीमदेव' ने कराया था, परंतु आशचर्य की बात यह हैं कि वैदिक काल से लेकर अब तक जगन्नाथ संप्रदाय उपस्थित हैं. उच्चस्तरीय नक़्क़ाशी और भव्यता लिए प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में एक खास पेड़ की लकड़ी से बनी आदिवासी मुखाकृति की तीनों प्रतिमाएँ हैं. इन तीन तीन मूर्तियो में पहला भगवान जगन्नाथ दूसरा बलभद्र और तीसरा उनकी बहन सुभद्रा की मूर्ति हैं. जगन्नाथ पूरी के मंदिर का गुंबद चवक्र तथा ध्वज से घिरा हुआ192 फुट ऊंचा हैं. सतह से इसकी उच्चाई 20 फुट ऊंची एक छोटी सी गोलाकार पहाड़ी पर स्थित हैं, जिसे 'नीलगिरि' नाम से सम्बोधित करते हैं. 12वीं सदी का सबसे उत्तम उदाहरण यह ऐतिहासिक मंदिर, नीलगिरि पर्वत पर 665 फुट लंबे, 665 फुट चौड़े घेरे और 22 फुट ऊँची दीवारों के मध्य कलिंग वास्तु-शैली बना हैं. ऐसी भी माना जाता हैं की यहॉं भगवान बुद्ध आये थे और यही उनका का दांत गिरा था, जिसके लिए इसे दंतपुर नाम दिया गया था.
इस रथयात्रा के लिए बलदेव, श्रीकृष्ण व सुभद्रा के लिए अलग–अलग तीन रथ बनाये जाते हैं. यहाँ हर एक रथ की अपनी अलग पहचान होती हैं. 13.2 मीटर ऊँचा 14 पहियों वाला लाल एवं हरा रंग का रथ बलभद्र की हैं जिसे 'पालध्वज' कहते हैं. नीला का 12.9 मीटर ऊँचे 12 पहियों वाला रथ सुभद्रा का हैं जिसे 'दर्पदलन' और लाल व पीला रंग का रथ भगवान जगन्नाथ का हैं जिसे 'नन्दीघोष' कहते हैं, जो 16 पहियों वाला 13.5 मीटर ऊँचा होता हैं. तो ऐसे में आप देख कर भी पहचान सकते हैं. आशचर्य की बात यह हैं की इस रथयात्रा के लिए रथों का निर्माण सिर्फ और सिर्फ लकड़ियों से ही होता हैं. इस रथ को बनाने में किसी भी तरह का कील या काँटा या कोई धातु का उपयोग नहीं किया जाता हैं. इसमें एक और अनोखी बात यह हैं की इस रथयात्रा महोत्सव में श्री राधिका जी के वजाय सुभद्रा और बलराम श्रीकृष्ण के साथ होते हैं.
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाली यह रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से दशमी तिथि तक नौ दिनों की हैं. स्कंद पुराण के अनुसार भगवन श्रीकृष्ण ने कहा था कि पुष्य नक्षत्र से युक्त आषाढ़ मास की द्वितीया तिथि को युद्ध, समुद्र तथा बलभद्र को रथ में बिठाकर यात्रा कराने वाले मनुष्य की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं. रथयात्रा में सबसे आगे बलभद्र जी उसके बाद बीच में सुभद्रा जी तथा सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ जी का रथ होता हैं. रथ जब चलने के लिए बिलकुल तैयार हो जाते हैं, तब पुरी के राजा 'छर पहनरा' रस्म को पूरा करते हैं जिसमे भगवन की प्रार्थना करने के बाद प्रतीकात्मक रूप से रथ मण्डप को सोना जड़े झाडू से साफ़ करते हैं. जिसके उपरांत ढोल, नगाड़ों, तुरही तथा शंखध्वनि के बीच भक्तगण इन रथों को खींचते हैं, जो सर्वाधिक प्रतीक्षित क्षण होता हैं. इस यात्रा को श्री गण्डिचयात्रा और घोषयात्रा की संज्ञा भी दी जाती हैं. इस महोत्सव के सभी पारंपरिक रीति-रिवाजों को अत्यंत श्रद्धा एवं भक्ति के साथ निभाया जाता हैं. सारा शहर श्रद्धालु भक्तगणों की भक्ति से सराबोर हो जाता हैं. वहां उपस्थित हर एक व्यक्ति भगवान जगन्नाथ की इस यात्रा में सम्मिलित होने की इच्छा रखता हैं. तीन मील के बड़दंड की यात्रा कर तीनों रथ शाम तक गुण्डिया मंदिर पहुंचते हैं. यहाँ भगवान 6 दिनों तक प्रवास करते हैं. दशमी तिथि को वापसी यात्रा होती हैं, जिसे बहुड़ाजात्रा कहते हैं. लौटने पर तीनों देवता एकादशी के दिन मंदिर के बाहर ही रथ पर दर्शन देते हैं. भक्तों द्वारा सुनाभेस की रस्म पूरी की जाती हैं जिसमे उनका स्वर्ण एवं रत्नाभूषणों से श्रृंगार किया जाता हैं. द्वादशी तिथि पर नीलाद्रिविंज की रस्म के साथ प्रतिमाओं का मंदिर में पुनः प्रवेश होता हैं. आषाढ़ मास में मलमास लगने पर नवकलेवर उत्सव मनाया जाता हैं जिसमे पुरानी मूर्तियों की जगह लकड़ी की नयी मूर्तियां बनायी जाती हैं. तथा पुरानी प्रतिमाओं को मंदिर परिसर के कोयती वैकुण्ठ नामक स्थान पर भूमि में समाधि दे दी जाती हैं.
यह रथयात्रा संस्कृति और सभ्यता का अनूठा उदाहरण हैं कहा जाता हैं की "रथारूढ़ भगवान श्री जगन्नाथ, देवी सुभद्रा तथा बालभद्र जी के दर्शन मात्र से ही प्राणी जन्म और मृत्यु के बंधनों से मुक्त हो जाता हैं". जगन्नाथ पुरी मंदिर स्थित रसोई में बना महाप्रसाद भी रथयात्रा में बहुत ही महत्व रखता हैं. इसमें दाल-चावल के साथ कई अन्य चीजें भी होती हैं, जो भक्तों को बेहद कम दाम पर उपलब्ध कराई जाती हैं. यहां विशेष रूप से नारियल, लाई, गजामूंग और मालपुआ का प्रसाद मिलता हैं.
रथयात्रा एक सामुदायिक पर्व हैं. जिसके दौरान यहाँ घरों में कोई भी पूजा तथा कोई उपवास नहीं रखा जाता हैं. जगन्नाथपुरी और भगवान जगन्नाथ की कुछ मौलिक विशेषताएं हैं. यहां किसी प्रकार का जातिभेद नहीं हैं. जगन्नाथ के लिए पकाया गया चावल वहां के पुरोहित नीची जाति के लोगों के द्वारा भी लायी जाती हैं. जगन्नाथ को चढ़ाया हुआ चावल को ही 'महाप्रसाद' की संज्ञा दी जाती हैं जो कभी अशुद्घ नहीं होता हैं . यह रथयात्रा एक तरह से हमे जाति और धर्म को भूलकर भाईचारे के बारे में सिखाती हैं. इस रथ यात्रा को जिस तरह से सभी एक होकर मानते हैं, वैसे ही एकता हमे हमेशा बनाए रखना चाहिए. लेकिन दुःख की बात यह हैं की लोग इस रथयात्रा के बाद लोग भाईचारे के भुला कर वही उच्च-नीच और छुआ-छूत के झूठे जाल में पहले की तरह ही उलझ जाते हैं.
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इस रथयात्रा के लिए बलदेव, श्रीकृष्ण व सुभद्रा के लिए अलग–अलग तीन रथ बनाये जाते हैं. यहाँ हर एक रथ की अपनी अलग पहचान होती हैं. 13.2 मीटर ऊँचा 14 पहियों वाला लाल एवं हरा रंग का रथ बलभद्र की हैं जिसे 'पालध्वज' कहते हैं. नीला का 12.9 मीटर ऊँचे 12 पहियों वाला रथ सुभद्रा का हैं जिसे 'दर्पदलन' और लाल व पीला रंग का रथ भगवान जगन्नाथ का हैं जिसे 'नन्दीघोष' कहते हैं, जो 16 पहियों वाला 13.5 मीटर ऊँचा होता हैं. तो ऐसे में आप देख कर भी पहचान सकते हैं. आशचर्य की बात यह हैं की इस रथयात्रा के लिए रथों का निर्माण सिर्फ और सिर्फ लकड़ियों से ही होता हैं. इस रथ को बनाने में किसी भी तरह का कील या काँटा या कोई धातु का उपयोग नहीं किया जाता हैं. इसमें एक और अनोखी बात यह हैं की इस रथयात्रा महोत्सव में श्री राधिका जी के वजाय सुभद्रा और बलराम श्रीकृष्ण के साथ होते हैं.
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाली यह रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से दशमी तिथि तक नौ दिनों की हैं. स्कंद पुराण के अनुसार भगवन श्रीकृष्ण ने कहा था कि पुष्य नक्षत्र से युक्त आषाढ़ मास की द्वितीया तिथि को युद्ध, समुद्र तथा बलभद्र को रथ में बिठाकर यात्रा कराने वाले मनुष्य की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं. रथयात्रा में सबसे आगे बलभद्र जी उसके बाद बीच में सुभद्रा जी तथा सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ जी का रथ होता हैं. रथ जब चलने के लिए बिलकुल तैयार हो जाते हैं, तब पुरी के राजा 'छर पहनरा' रस्म को पूरा करते हैं जिसमे भगवन की प्रार्थना करने के बाद प्रतीकात्मक रूप से रथ मण्डप को सोना जड़े झाडू से साफ़ करते हैं. जिसके उपरांत ढोल, नगाड़ों, तुरही तथा शंखध्वनि के बीच भक्तगण इन रथों को खींचते हैं, जो सर्वाधिक प्रतीक्षित क्षण होता हैं. इस यात्रा को श्री गण्डिचयात्रा और घोषयात्रा की संज्ञा भी दी जाती हैं. इस महोत्सव के सभी पारंपरिक रीति-रिवाजों को अत्यंत श्रद्धा एवं भक्ति के साथ निभाया जाता हैं. सारा शहर श्रद्धालु भक्तगणों की भक्ति से सराबोर हो जाता हैं. वहां उपस्थित हर एक व्यक्ति भगवान जगन्नाथ की इस यात्रा में सम्मिलित होने की इच्छा रखता हैं. तीन मील के बड़दंड की यात्रा कर तीनों रथ शाम तक गुण्डिया मंदिर पहुंचते हैं. यहाँ भगवान 6 दिनों तक प्रवास करते हैं. दशमी तिथि को वापसी यात्रा होती हैं, जिसे बहुड़ाजात्रा कहते हैं. लौटने पर तीनों देवता एकादशी के दिन मंदिर के बाहर ही रथ पर दर्शन देते हैं. भक्तों द्वारा सुनाभेस की रस्म पूरी की जाती हैं जिसमे उनका स्वर्ण एवं रत्नाभूषणों से श्रृंगार किया जाता हैं. द्वादशी तिथि पर नीलाद्रिविंज की रस्म के साथ प्रतिमाओं का मंदिर में पुनः प्रवेश होता हैं. आषाढ़ मास में मलमास लगने पर नवकलेवर उत्सव मनाया जाता हैं जिसमे पुरानी मूर्तियों की जगह लकड़ी की नयी मूर्तियां बनायी जाती हैं. तथा पुरानी प्रतिमाओं को मंदिर परिसर के कोयती वैकुण्ठ नामक स्थान पर भूमि में समाधि दे दी जाती हैं.
यह रथयात्रा संस्कृति और सभ्यता का अनूठा उदाहरण हैं कहा जाता हैं की "रथारूढ़ भगवान श्री जगन्नाथ, देवी सुभद्रा तथा बालभद्र जी के दर्शन मात्र से ही प्राणी जन्म और मृत्यु के बंधनों से मुक्त हो जाता हैं". जगन्नाथ पुरी मंदिर स्थित रसोई में बना महाप्रसाद भी रथयात्रा में बहुत ही महत्व रखता हैं. इसमें दाल-चावल के साथ कई अन्य चीजें भी होती हैं, जो भक्तों को बेहद कम दाम पर उपलब्ध कराई जाती हैं. यहां विशेष रूप से नारियल, लाई, गजामूंग और मालपुआ का प्रसाद मिलता हैं.
रथयात्रा एक सामुदायिक पर्व हैं. जिसके दौरान यहाँ घरों में कोई भी पूजा तथा कोई उपवास नहीं रखा जाता हैं. जगन्नाथपुरी और भगवान जगन्नाथ की कुछ मौलिक विशेषताएं हैं. यहां किसी प्रकार का जातिभेद नहीं हैं. जगन्नाथ के लिए पकाया गया चावल वहां के पुरोहित नीची जाति के लोगों के द्वारा भी लायी जाती हैं. जगन्नाथ को चढ़ाया हुआ चावल को ही 'महाप्रसाद' की संज्ञा दी जाती हैं जो कभी अशुद्घ नहीं होता हैं . यह रथयात्रा एक तरह से हमे जाति और धर्म को भूलकर भाईचारे के बारे में सिखाती हैं. इस रथ यात्रा को जिस तरह से सभी एक होकर मानते हैं, वैसे ही एकता हमे हमेशा बनाए रखना चाहिए. लेकिन दुःख की बात यह हैं की लोग इस रथयात्रा के बाद लोग भाईचारे के भुला कर वही उच्च-नीच और छुआ-छूत के झूठे जाल में पहले की तरह ही उलझ जाते हैं.
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