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हममे से करीब करीब 95 फीसदी लोगो को कुछ भी होने पर डॉक्टर की सलाह लिए बिना ही ऐंटीबायॉटिक ले लेते हैं. क्योकि ऐसे में हम सोचते है कि डॉक्टर को फी में देने वाली रकम के साथ साथ समय की भी बचत हो जाती हैं. लेकिन हम यह नही सोचते हैं कि यह हमे कितना नुकसान पंहुचा सकता हैं. इस तरह से ऐंटीबायॉटिक लेने के कारण शरीर की रोगरोधक धीरे धीरे ख़त्म हो जाती हैं. और यदि उसके बाद आपको सर्दी या छोटा सा घाव भी आपके मौत का कारण हो सकता हैं. शोधकर्ताओं का मानना है कि भारत के पानी, नालों, जानवरों, मिट्टी और बड़ी तादाद में इंसानों के अंदर बड़ी संख्या में ऐसे जीवाणु मौजूद हैं जिनपर किसी भी तरह के ऐंटीबायॉटिक का कोई असर नहीं होता हैं. आपको बता दे कि मशहूर संगीतज्ञ यू. श्रीनिवास का 45 साल की उम्र में निधन हो गया. जिसके पीछे एक ऐसा ही लाइलाज संक्रमण था, जिसका इलाज दुनिया के किसी भी डॉक्टर के पास नहीं था. भारतीय अस्पताल तो ऐसे लाइलाज संक्रमणों का कारखाना ही बन गए हैं. आकड़ो कि बात करे तो 2008 के बाद यह के अस्पतालों में मल्टीड्रग रेज़िस्टेंट इंफेक्शन्स से ग्रस्त मरीजों की संख्या अनपेक्षित बढ़ रही है. इसका सबसे बड़ा कारण है ऐंटीबायॉटिक के इस्तेमाल को लेकर लोगों में जानकारी का अभाव. एक - दो अस्पताल को छोड़ दे तो भारत के सभी अस्पतालों में साफ-सफाई कि बड़ी दिक्कत हैं. और जहां साफ- सफाई थोड़ी बहुत हैं भी वहा इतनी भीड़ होती हैं कि कितनी भी सफाई हो थोड़े समय बाद फिर से वही हालात हो जाता हैं. ऐसे में शौचालय भी गन्दा होता हैं हाथ धोने का साबुन भी उपलब्ध नही होता. साथ ही साथ पानी भी गंदा होता है. जिसकी वजह से लाइलाज जीवाणुओं के संक्रमण का खतरा बना रहता है. जो इसे फैलने में मदद करता हैं.
यहां ऐंटीबायॉटिक्स के बिकने पर लंबे समय तक कोई रोक-टोक नहीं थी. बिना डॉक्टर की पर्ची के आसानी से किसी दवा दुकान में जाकर ऐंटीबायॉटिक खरीद सकते हैं. जो ऐंटीबायॉटिक्स के बेअसर होने के मामलों की सुनामी का कारण हैं. बताया जा रहा हैं कि विकसित देशों के मुकाबले विकासशील देशों में ऐसे जीवाणुओं की मौजूदगी ज्यादा है, जो कि ऐंटीबायॉटिक्स के प्रतिरोधक होते हैं. भारत इस मामले में पहले नंबर पर है. क्योकि किसी भी अन्य देश के मुकाबले भारतीय कहीं ज्यादा ऐंटीबायॉटिक इस्तेमाल करते हैं. ऐसा नहीं कि केवल भारत पर ही संकट है, बल्कि भारत की सीमाओं से निकलकर यह संक्रमण दुनिया के कोने-कोने तक फैल रहा है. इसमें कोई दो राय नही है कि 20वीं सदी में ऐंटीबायॉटिक्स की खोज एक चमत्कार जैसी थी. स्वच्छता और साफ-सफाई की बेहतर मौजूदगी नहीं होने के कारण संक्रमण के खतरों को कम करने के लिए ऐंटीबायॉटिक्स पर निर्भरता काफी बढ़ जाती है. जिसके कारण इंसानों की जिंदगी काफी बेहतर हुई. लेकिन ऐंटीबायॉटिक्स के बेतहाशा इस्तेमाल से होने वाली परेशानियों को देखते हुए स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़े लोग कई सालों से चेतावनी दे रहे थे. अमेरिकी अधिकारियों ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया. जिसके बाद ओबामा प्रशासन ने भी सितंबर 2014 में इस समस्या से निपटे के लिए उपायों की घोषणा की.
हर साल विदेशों से लोग इलाज कराने भारत में आते हैं. लेकिन सुपरबग की खोज भारत के इस कारोबार को भी झटका दे सकती है. सुपरबग के संक्रमण का खतरा सबसे ज्यादा टीबी ,कैंसर , ऑपरेशन कराने वाले मरीज या फिर ऑर्गन-हड्डी ट्रांसप्लांट कराने वाले लोगों में ज्यादा होता है. भारतीय टीबी मरीजो के 10 फीदसी मरीज में सुपरबग पाया जाता हैं. जिसका कोई इलाज नही हैं. सबसे खास बात यह है कि इन मरीजों को अस्पतालों में नहीं, बल्कि अपने घरों पर यह संक्रमण होता है. इस हालात में इसे को रोकना काफी मुश्किल है. इस बारे में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया गंभीरता दीखते हुए पशुपालन पर एक शोध करवाया. यह शोध मुर्गे-मुर्गियों पर हुआ , जिससे पता चला कि 40 फीसद मुर्गे-मुर्गियों के अंदर ऐसे जीवाणु पाए गए जिनपर किसी भी ऐंटीबायॉटिक्स असर नहीं होता हैं. ऐसे मुर्गों को जब लोग खाते हैं, तो ये जीवाणु उनके अंदर भी चले जाते हैं. नैशनल इंस्टिट्यूट फॉर रिसर्च इन टीबी की निदेशक डॉक्टर सौम्या स्वामीनाथन ने एक अखबार को दिए गए अपने इंटरव्यू में बताया था कि यदि समय रहते सरकार गंभीर और तत्काल कार्रवाई नहीं करती है, तो जल्द ही भारत में टीबी लाइलाज बीमारी हो जाएगी. यदि ऐंटीबायॉटिक्स के धड्ड्ले से हो रहे इस्तेमाल को रोक नही गया तो टीवी तो दूर की बात हैं. सर्दी- जुकाम या आपके शरीर पर लगी एक छोटी सी खरोच भी लाइलाज हो जाएगी. ऐसे में जागरूकता की जरूरत है. साफ-सफाई रखने की जरूरत हैं. और साथ ही आपके हर एक छोटी बड़ी परेसानी में डॉक्टर के सलाह की जरूरत हैं. जो आपको और आपके परिवार को बिन मांगे मौत से सुरक्षित रहने में मदद करता हैं.
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