खत्म हुआ रेलेव का वीआईपी कल्चर - To slug out vip culture in indian railways

वीआईपी कल्चर हमारे देश का सबसे बड़ा दुर्गुण हैं. इससे उबरने में अभी भी वक्त लगेगा. पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी ने यह नियन लागु करवाया की लाल बत्ती देश के सिर्फ 5 लोग ही इस्तेमाल कर सकते है. इसके बाद से मंत्रियो के साथ साथ जो भी लाल बत्ती इस्तेमाल कर रहा था उसने हटा दिया. देखा जाय तो यह लोगो के लिए इतना आसान नहीं था. क्योकि मंत्री जी के  नाम पर उनके रिस्तेदार, उनके जानने वाले उनके मित्र और इन सभी लोगो के बच्चे भी अपनी अपनी गाड़ियों पर लाल बत्ती लगा कर खुद को मानती ही समझते थे. खैर आज लालबत्ती का गैरजरूरी इस्तेमाल रुक गया हैं. यह भी एक वीआईपी कल्चर ही था. लेकिन अभी भी यह कल्चर हमारे समाज में व्यप्त हैं.


रेल मंत्री पियूष गोयल ने रेलवे मंत्रालय में वीआईपी कल्चर को खत्म करने की पहल की हैं. जिसके अंतर्गत जितने भी ऑफिसर ग्रैड के लोग हैं उनके घर काम करने वाले कर्मचारी सभी अपने काम पर लौटेंगे. आपको बता दे कि जितने भी कर्मचारी ऑफिसर के घरो में काम करते हैं उनकी भर्ती इसके लिए होती ही नहीं हैं. उनकी भर्ती ट्रैकमैन या समूह 'ग' या 'घ' में होती हैं जिनका काम साफ-सफाई  से लेकर ट्रैकों की देखभाल होता हैं जो उनके भर्ती होते ही निश्चित हो जाता हैं की किसको क्या करना हैं. लेकिन इसके बावजूद इन्हे ऑफिसर के घर पर उनके निजी कामो में लगा दिया जाता हैं. हालाँकि ऐसा होना नहीं चाहिए. देखा जाय तो यह रेलवे ही नहीं हर एक विभाग में हैं. जहा सरकार के चपरासी साहब के घर का सब्जी लाने से लेकर उनके बच्चो को स्कूल छोड़ने और उनकी पत्नी को ब्यूटी पार्लर ले जाने तक का भी काम करते हैं. जो सरासर गलत हैं. सरकार ने आपके लिए चपरासी  रखा हैं  इसका मतलब यह कतई नहीं होता हैं की वह आपके बच्चे और बीवी का भी चपरासी हैं.


सोचने वाली बात यह है की कर्मचारियों के कमी के कारण लगातार रेलवे दुर्घटनाये हो रही हैं और 30 हजार ट्रैकमैन अफसरों की खातिदारी में लगे हुए हैं. इतना ही नहीं यात्रा के समय भी इनको इनको वातनकुलित के पहले और दूसरे श्रेणी ही चाहिए वो भी सरकार के पैसो पर या यु कहे की जनता के पैसो पर. ऐसे में रेल मंत्री का वीआईपी कल्चर को खत्म करना बिल्कुल सही हैं. 


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