"आंदोलनों का पहले स्वरूप और मकशद बदलना चाहिए"-" Change AIM and Face of Protest"

"नए स्वराज का सपना दिखा कर सत्ता के शीर्ष पर काबिज होना मकशद बन गया है आंदोलनों का"
और फिर लूट खसोट चलती है, जहा लूट सकते हो लूट लो, लूटने वाले का नाम बदल जाता हैं! कोई कहता है मैं परिस्थितियों को बदल दूंगा, जिससे किसान आत्महत्या नहीं करेंगे, सैनिक सीमा पर नहीं मरेंगे, मैं गरीबी मिटा दूंगा, लेकिन किसानो  की आत्महत्या कैसे रुकेगी ये कोई नहीं बताता? क्या अलग करेंगे जिससे सैनिक सीमा पर नहीं मरेंगे ? कैसे गरीबी मिटा देंगे? ये कोई नहीं बतलाता है.


सत्ता में आते ही उनकी रोजो रोटी चलने लगती है, और फिर रिबन काटना, योजनाओ के नाम बदलना, संस्थाओ के नाम बदलना और फिर नारियल फोड़ कर लोगो को बरगलाने की कोशिश करना, देखो जी ये मैंने काम किया है इससे पहले की सरकार नहीं कर पाई और आपने हमे चुना हमने यह कर दिया.

लेकिन आम जनता वही की वही है, आज भी भारत में रोज भूख से मरने वालो की संख्या 7000 से ऊपर है. और 25 लाख लोग हर साल भूख से मर जाते है, और लगभग 9000 लाख लोगो की आमदनी आज भी 20 रूपये प्रति दिन से भी कम है. आज भी एक साल में 10 हजार  से ज्यादा किसान आत्महत्या कर लेते है. सैनिको के मरने की तादाद दिन प्रतिदिन सौकड़ो में बढ़ती ही जा रही है.

मैं पूछता हूँ आंदोलन करनेवालों से "क्या कोई ठोस खाका है आपके पास परिस्थितियों को बदलने के लिए अगर नहीं:-
तो पहले खाका बनाओ फिर आओ"
आंदोलनों  का पहले स्वरूप बदलना चाहिए शब्दों के हेरे फेर से और नए नए नरो से इतिहास नहीं बदलता, वास्तव में आम जन मानस के जीवन स्तर में  बदलाव आये इसके लिए प्रयास करना चाहिए!

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